कविता:रिमझिम रातों की वर्षा
बादल गरजा,
बिजली चमका,
झर...झर...झर-सा,
फिर भी वर्षा बरसा |
ठनका ठनकता है,
बिजली को चमकाता है,
टिप-टिप-टिप-सा होता है,
फिर भी बादल वर्षा बरसाता है |
बिजली की चमक-लहरें, होती है वैसे,
जब पानी की बूंदों पे पड़ती हैं ऐसे,
मानो दिल की धड़कन में, खुशी का प्रकाश समा गया हो जैसे,
फिर भी बादल से वर्षा बरसे |
बिजली चमका, बादल बरसा |
छप्पर-छतरी में करें, झर...झर वर्षा,
पत्थर-पत्तों में करें, ठप-ठप वर्षा,
फिर घनघोर बादल से वर्षा बरसा |
इस मौसम की हवाएं के झोंके,
दे हमारे नींदों को आनंद,
इस रिमझिम रातों की वर्षा,
का नाम है रामानंद |
कवि:-विवेकराज
18/08/2009



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Mast poem
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