कविता:हमारी प्यारी स्वीटी
एक परी लाखों में एक, करोड़ों में एक,
अब तक हमारी नजरों में, दुनिया वालों में से एक,
शायद होगी आप ईश्वर की एक प्रीति,
कहां से बनकर आई, हमारी प्यारी स्वीटी |
ईश्वर ने कितनी फुर्सत से बनाई है तुम्हें,
हर रंग-रूप सजाने में, कितने बिताएं होंगे वक्त और लमहे,
खुशनसीब होगी वो मां जिनकी होगी यह फूल-सी प्रीति,
कहां से बनकर आई, हमारी प्यारी स्वीटी |
कितनी मासूम कितनी भोली-सी सूरत,
मानो कि लगता है, लक्ष्मी जैसी एक मूरत,
पवित्र हो जाती वह धरती जिनके चरण से स्पर्श करती माटी,
कहां से बनकर आई, हमारी प्यारी स्वीटी |
निकली आप की सुर-आवाज, मानो जीवन की गीत मीठी,
खुशकिस्मत हैं आप, जो अपने माता-पिता-ईश्वर की प्यार पाती,
प्यार भरी बातें करना;दिल जीतना, यही है आपकी एक रिती ,
कहां से बनकर आई, हमारी प्यारी स्वीटी |
जन-जन को सीख देती, सरस्वती-सी विद्या वाली,
घर घर को खुशियां-सुख देती, लक्ष्मी-सी चंचल वाली,
सजेगी जिंदगी उन खुशनसीब की, जिसे मिलेगी यह तकदीर की सीटी,
कहां से बनकर आई, हमारी प्यारी स्वीटी |
आप है, माता-पिता-ईश्वर की पुत्री व साथी,
भगवान करे ! मैं बनू आपका अपना प्यारा जीवनसाथी,
हमारी प्यारी स्वीटी के नाम विवेकराज की यह कविता-कृति,
कहां से बनकर आई, हमारी प्यारी स्वीटी |
कवि:विवेकराज
24/10/2012



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