AUTHOR

header ads

कविता:क्या खुद पे भी कभी हंसे हो तुम [ Kya Khud Pe Bhi Kabhi Hanso Ho Tum ][ Have you ever laughed at yourself ]

कविता:क्या खुद पे भी कभी हंसे हो तुम

मैंने ऐसा क्या कह दिया,
जो सुनके व्यंग्य हंस रहे हो तुम,
तुम्हारी यह हंसी दंतुरित-सा है मुस्कान,
न जाने किस चीज के बने हो तुम |

हम तो जीवन के हर पहेलियों को सुलझाते रहे हैं,
न जाने किस पहेली को सुलझा रहे हो तुम,
हम तो पहेलियों  की हर मोड़ से गुजर आए,
न जाने किस मोड़ पर खड़े हो तुम |

हम तो जीवन के सुख-दुख समय के हैं साथी,
न जाने किस के साथ ही हो तुम,
हम तो सबकी नजरों में है महामानव,
न जाने कैसे एक-जैसे हो तुम |

हम तो सवाल करके जीवन के हर जवाब को ढूंढते रहे हैं,
“ मैं क्या हूं” क्या खुद पे भी कभी प्रश्न किए हो तुम,
हर लम्हों पर सुनके व्यंग्य हंस रहे हो तुम,
क्या खुद पे भी कभी हंसे हो तुम |

                                                                               
कवि:-विवेकराज
                                                                                         9/4/2011

Post a Comment

0 Comments