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कविता:क्या कहूं मैं दोस्तों के बारे में [ Kya Kahu Mai Doston Ke Bare Me ]


क्या कहूं मैं दोस्तों के बारे में,
एक साथ निभाते और
दूजा साथ छोड़ जाते हैं जैसे गली व चौराहे में,
क्या कहूं मैं दोस्तों के बारे में |

क्या कहूं मैं दोस्तों के बारे में,
वक्त व जरूरत में एक मेरी मांग पे पैसे भी देते,
और दूजा मना भी करते अपनी एक जुबानी में,
क्या कहूं मैं दोस्तों के बारे में |

अरे ! क्या कहूं मैं दोस्तों के बारे में,
कुछ है ईर्ष्यालु, कोई मुंहफट, कोई फेंकबाज,
और कुछ है नेकदिल ऐसे ही कई हैं अपनी-अपनी स्वभावों में,
अरे ! क्या कहूं मैं दोस्तों के बारे में |

अरे ! क्या कहूं मैं दोस्तों के बारे में,
कोई गाली-भरी अपशब्द कहता; कोई दिखावे-भरी डींग हाँकता,
और कोई अपनी ज्ञान-प्रसार करता जैसे अपनी अनुभव व विचारों में,
क्या कहूं मैं दोस्तों के बारे में |

क्या कहूं मैं दोस्तों के बारे में,
कोई एक, पार्टी व जश्न करने का मन की जोर भी देते ,
और एक है जो चिढ़ जाते दूजे के फरमाइश बातों में,
अरे ! क्या कहूं मैं दोस्तों के बारे में |

क्या कहूं मैं ऐसे दोस्तों के बारे में,
एक मुँहफट से बातेंं न करो तो दूजे से ऐसे उलझते,
जैसे “आ बैल मुझे मार” वाली कहावतओं में,
क्या कहूं मैं दोस्तों के बारे में |

                                                                                               
                                                                                                     कवि: विवेकराज
                                                                                                            23/08/19

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